चौताल – शिव शंकर दीनदयाल
शिव शंकर दीनदयाल, महा वरदानी।
अंग विभूति लिए मृगछाला, जटा गंगा उर्जझानी ।
माथे उनके तिलक चंद्रमा हो
जाके तीनि नयन जग जानी, महा वरदानी ।
वाहन बयल त्रिशूल बिराजत, कर नागिनि लपटानी ।
भाँग धतूर बेल की पाती हो ।
भोला और जहर विष सानी, महा वरदानी ।
श्वेत वसन गर मुंडन माला, संग में गौरी भवानी ।
लिंग पूजावत डमरू बजावत ।
तहाँ गावत बहु विधि बानी, महा वरदानी ।
महा देव देवन के राजा, और गुनन की खानी ।
तुलसीदास चरनन पर मोहित ।
तहाँ गाल बजावै सुरतानी, महा वरदानी ।
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