धमारि – देखन चले फुलवारी
दोऊ कुँअर निहारी, जानिकी देखन चले फुलवारी
राम लखन को रूप निहारत
हँस हँस जनक दुलारी
राम लखन को नैन रसीले
रस वश भई सब नारी
सिय लखि कंगन में परछाई
पलक जात नहीं टारी
उन के शोभा कहाँ लगि बरनो
तुलसीदास बलिहारी
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