चौताल – सखी ये दोउ भूपकिसोर
सखी ये दोउ भूपकिसोर समाजमें आई।
कठिन कठोर धनुष शंकरको,नहि कोउ लेत उठाई।
भूप सहस दश एकहि बारा हो,
धनु छुवत दून होइ जाई समाजमें आई।
थोक वीर धनुष नहि हालत, किहो अनेक अपाई।
तोरिहैं धनुष अवधके बालक
दोउ कुँवर खड़े मुसकाई समाजमें आई।
गुरु आज्ञा लै उठें रामजी, धनुहां हाँथ लगाई।
लेत उठावत कोउ नहिं देखो हों,
धनु तोरिकै देत बहाई समाजमें आई।
टूट पिनाक शब्द भय भारी, रविरथ नहिं ठहराई।
तुलसीदास हिये हुलसी हुलसी कहि,
सब देवनके मन भाई समाजमें आई।
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