चौताल – गौरी पूजत जनक दुलारी
गौरी पूजत जनक दुलारी बैठी फुलवारी
करि असनान साज सब साज्यो, पहिरि गुलाबी सारी।
गंगाजलकी झारी लिहे करे
देवी कर दर्शन करि बलिहारी बैठी फुलवारी।
तेहि छन सामा लै थारीमे आरती लेत उतारी।
विविध भाति पूजा करि सुमिरत
वर मांगती है भुज चारी बैठी फुलवारी।
बोली भवानी अन्तरजानि, बानी सुनो हमारी।
अवध नरेशके बालक रघुवर
तेरे मांग सेंदुर उन डारि बैठी फुलवारी।
परा भरोस सियाजीके मनमें, अब न रहो कुमारी।
तुलसीदास दोउ कुंवर खड़े जहां
सब हरषित नर अरु नारी बैठी फुलवारी।
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