चौताल – देवी शारद सुमिरि
देवी शारद सुमिरि मनावो ह्रदय से जानी
सुमिरन करो राम अरु लक्ष्मण भरत भुआल बखानी
सुमिरन करों श्री मातु जानकी हो
तुम हो तीन लोक की रानी, ह्रदय से जानी
शिव शंकर भोला को सुमिरों, सुमिरों गौरी सयानी
फिर से सुमिरों गणेश की मूरति हो
अति सुन्दर पंडित ज्ञानी, ह्रदय से जानी
करि सुमिरन अंजनी के नन्दन, मेरी अरज यह मानी
फिर से सुमिरों श्री मातु भगौती हो
तुम ही हो आदि भवानी, ह्रदय से जानी
तुलसीदास सुमिरन कर गावत, सुर से ऐसा बानी
सब देवन से आज्ञा लेके हो
बाजे ढोल मंजीरा आनी, ह्रदय से जानी
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