धमारि – नदी बहै जलधारा
जोगी आग तन जारा सन्तो नदी बहै जलधारा।
पुरइन पात जलहिमें उपजे, जलहिमें करे पसारा।
वाके पात पानि नहिं लागै,ढरकि परे जैसे पारा।
जैसे सती चढ़ी सत ऊपर, पिया वचन नहिं टारा।
आपु तरै औरनको तारै, तारै कुल परिवारा।
जैसे सूर चढ़ै लड़नेको, प्रेम मगन ललकारा।
जाकी सुरति रही लड़नेको, धै धै शूर पछारा।
भवसागर एक नदी बहत है, लख चौरासी करारा।
संत रहे सो पार उतरिगे, निगुड़ा बुड़ै मँझारा।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
