Holi Songs – Hindi

चौताल – रघुनन्दन अवधबिहारी

रघुनन्दन अवधबिहारी केशर रंग मारी। 

अबिर गुलाल कुमकुमा केशर,घोरि भरैं पिचकारी। 
लखि लखि रंग अंग पर मारत,
मोरी ललित भई तन सारी केशर रंग मारी। 

चंचल चोट लगि छतिया पर विकल भई सब नारी। 
मोतिनकी लर टूट गई सब,
मोरी अंग भई मतवारी केशर रंग मारी। 

बांके छैल संग रघुवरके, देत निलज होइ गारी। 
अबिर गुलाल कपोलन मींजत,
मोरी धरि बहियां ललकारी केशर रंग मारी। 

खेलत फागु अवधके वासी, सियाकी और निहारी। 
दास दयाल दया समरथकी हो,
धनि धनि सिया जनकदुलारी केशर रंग मारी। 


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