धमारि – व्रज में हरि होरी मचाई
व्रज में हरि होरी मचाई ।
इतते आई सुघर राधिका, उतते कुँवर कन्हाई।
खेलत फाग परसपर हिलिमिलि, सोभा बरनी न जाई।
घरे घरे बजत बधाई।
राधे सैन’ दियो सखियन को, झुंड-झुंड होई धाई।
झपटि लपटि गईं साम सुनर को, कर धरि पकरि मँगाई।
कान्हा को नारि बनाई।
छीन लियो मुरली पितम्बर, सिर से चुनर ओढ़ाई।।
बेंदी भाल, नयन बिच काजर, नकबेसर पहनाई।
सामजी को नाच नचाई।
सुसकत है मुख मोरि मोरिके, काह भई चतुराई।
काह भये तेरो नन्द बबाजी कहाँ यशोमति माई।
लालको न लेत चौड़ाई।
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