चौताल – कान्हा देत मुसुकियन
कान्हा देत मुसुकियन गारी धरे मेरी सारी।
तुमतौ ढोता नन्द बबाके, मैं वृषभानु दुलारी।
बेंचन आई पिताजी की चोरी हो,
सुनिपैहै जाब घर मारी धरे मेरी सारी।
जाय कहों घर कंस राजाके, नई मति सौंचारी।
कबहुँ न दाम लगे जमुना पर,
तुम बीच करो ठगहारी धरे मेरी सारी।
कंसको मारि नई विध्वंस करो सखी, सुनिए हाल हमारी।
हमतों रारि करत जमुनापर,
तुम देखहु नयन पसारी धरे मेरी सारी।
रङ्गभरी मदमत्त ग्वालिनी, बोलो वचन सम्हारि।
द्विज हरिचरण शरण गुरुजीकी
देके दान चली वृजनारी धरे मेरी सारी।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
