ए ऋषि तू ने हलाहल पीकर
ए ऋषि तू ने हलाहल पीकरज़िन्दगी दी हमको दर्द में जीकरतेरे एहसानों का बदला न चुका पायेंगेसदियाँ गुज़रेंगी तुमको न भूला पायेंगे कोई खंजर दिखाता था, कोई पत्थर बरसाता थाकहीं थे रोटी के लाले, तो कोई ज़हर पिलाता थादुनिया का मेला था, दयानन्द अकेला थासारा जहाँ था एक तरफ, और ऋषि अलबेला थाआर्य दीवानों से, कितने परवानों सेजगमगा दी महफिल, वेद के गानों सेशम्माँ जो तुमने की रौशन, उसे फैलायेंगे विकट बिजली चमकती हो, भयंकर घन गरजते होंउठी हो आंधियां भीषण, निरन्तर जल बरसता होशबनम के धारों में, पतझड़ में खारों मेंआँघी हो या तूफान, या जलते अंगारों मेंहर तरफ…
